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मेरा अपना कोई नहीं ।

मेरा अपना कोई नहीं

मेरा अपना कोई नहीं उस वक़्त में रातें सोई नहीं मेरा अपना कोई नहीं
एक कश्ती दी छोटी मुझको और सामने गहरा दरिया था
मैं खुश कैसे तन्हाई मैं ये दुःख देने का ज़रिया था
वो आँख भी उस दिन रोइ नहीं के मेरा अपना कोई नहीं
वो फुल पतझड़ में खिला हुआ वो शक़्स किसी से मिला हुआ
वो लम्हें साथ बिताए जो उन लम्हों का भी गिला हुआ
वो फसल जो मैंने बोई नहीं के मेरा अपना कोई नहीं
टूट - टूट कर बिखरा था पत्थर चोंटो से निखरा था
पत्थर ही था पत्थर ही रहा मैं खुद पर कैसे इतराता
हर रात आस सवेरे की जो न दिखता उस चेहरे की
ये जंग ही है खुद की खुद से ना तेरे की ना मेरे की
वो ज्योत भी फिर से जोई नहीं के मेरा अपना कोई नहीं
हर घाव दवा को तरसा है तू मुझ पर ही क्यों बरसा है
ए ख़ुदा बता क्या गुनाह हुआ अब चैन आए को अरसा है
जैसे गरम हवा खलियानों में कितना गम मेरे तरानों में
हर लेख में एक कहानी है जो बीत रही वो जवानी है
जो पीकर मेरी प्यास बुझे कहाँ वो दरिया का पानी है
ईर्द - गिर्द देखूं जब भी कोई नहीं दिखता अब भी

तनहा ही था तनहा ही रहा के रूठ चुका मेरा रब भी
पर उम्मीद अभी भी खोई नहीं के मेरा अपना कोई नहीं
- प्रशान्…