Wednesday, 4 March 2020

मचल रही है आरज़ू



मचल रही है आरज़ू 
जल रही है आबरू

इस ज़लज़ले से भाग तू
सो मत अब जाग तू

तू क्या है ये ज्ञात कर
शीशे से तू ये बात कर

हो तुझको तेरी जुस्तजू

मचल रही है आरज़ू
जल रही है आबरू

अपनो को दिल है खोजता
न मिलने पर है सोचता

मैं किस किस पर बोझ था
कितने दिन मैं रोज़ था

ज़रूरतों पर दौड़ता
किसके हाथ जोड़ता

दौडूं ओर या सांस लूँ

मचल रही है आरज़ू
जल रही है आबरू

तिलतिल हूँ मर रहा
क्या किया था क्या कर रहा

वो दिया भीतर जल रहा
वो लोहा भी पिघल रहा

ज़िंदा है अभी रूह भी
कोयल भी है और कुह भी

आ खुद को खुद ही हाथ दूँ

मचल रही है आरज़ू
जल रही है आबरू

मैं कब तक ये सब सहन करूँ
मर जाऊँ या रहम करुँ

के अब शायद सब अच्छा हो
खुश होऊं या वहम करुँ

महसूस नहीं होता कुछ भी
साथ चले खुशियाँ दुःख भी

सीने में अटकी सांस यूँ

मचल रही है आरज़ू
जल रही है आबरू



अप्रतिम और अप्रकाशित                                                                   By PRASHANT GURJAR



you can also follow me on -

Instagram - @prashant gurjar
Facebook - #blank voice
Youtube - Blank voice

No comments:

Post a Comment