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मचल रही है आरज़ू

मचल रही है आरज़ू  जल रही है आबरू इस ज़लज़ले से भाग तू सो मत अब जाग तू तू क्या है ये ज्ञात कर शीशे से तू ये बात कर हो तुझको तेरी जुस्तजू मचल रही है आरज़ू जल रही है आबरू अपनो को दिल है खोजता न मिलने पर है सोचता मैं किस किस पर बोझ था कितने दिन मैं रोज़ था ज़रूरतों पर दौड़ता किसके हाथ जोड़ता दौडूं ओर या सांस लूँ मचल रही है आरज़ू जल रही है आबरू तिलतिल हूँ मर रहा क्या किया था क्या कर रहा वो दिया भीतर जल रहा वो लोहा भी पिघल रहा ज़िंदा है अभी रूह भी कोयल भी है और कुह भी आ खुद को खुद ही हाथ दूँ मचल रही है आरज़ू जल रही है आबरू मैं कब तक ये सब सहन करूँ मर जाऊँ या रहम करुँ के अब शायद सब अच्छा हो खुश होऊं या वहम करुँ महसूस नहीं होता कुछ भी साथ चले खुशियाँ दुःख भी सीने में अटकी सांस यूँ मचल रही है आरज़ू जल रही है आबरू अप्रतिम और अप्रकाशित                                                                     By PRASHANT GURJAR you can also follow me on -