Posts

Showing posts from October, 2019

रूहों का क़त्ल ।

रूहों का क़त्ल हुआ ओर मौत को भी शर्म आई
उतरा जब मैं मैदान-ए- जंग में तो मेरे सामने वफ़ा आई
के ज़ुल्म मैं उस पर भी करता ज़रूर पर उसे बचाने में भी मेरी ही दुआ आई
ज़लील होता मैं अगर बक्श देता फिर उसने भी नज़रें झपकाई
मैंने वफ़ा का लिहाज़ रखा और मुझे मार गयी बेवफाई
ठीक उसी समय रूहो का कत्ल हुआ  और मौत को भी शर्म आई
के इरादा नैक था तो मोहब्बत करने लगे   इश्क़ हमने किया और हम बस उनकी जरूरत बनने लगे
के कातिल ने फ़िर अपनी ज़ुल्फें हवा में लहराई
किसी का दिल टुटा और कब्र आशिक़ ने अपनी कुछ यूं खुदाई 
रूह का कत्ल हुआ और मौत को भी शर्म आई
फ़र्श पर बिखरे टुकड़े थे एक गाना था कुछ मुखड़े थे
राग छिड़ा मोहब्बत का जब सुर कुछ उखड़े - उखड़े थे
मोहब्बत फिर अब खत्म हुई  किसी के घर मातम मना ओर किसी के घर बजी शेहनाई 
रूहों का क़त्ल हुआ  ओर मौत को भी शर्म आई


अप्रतिम और अप्रकाशित                     By PRASHANT GURJAR


you can also follow me on -
Instagram - @prashant gurjar Facebook - #blank voice Youtube - Blank voice