Sunday, 20 October 2019

रूहों का क़त्ल ।



रूहों का क़त्ल हुआ
ओर मौत को भी शर्म आई

उतरा जब मैं मैदान-ए- जंग में तो
मेरे सामने वफ़ा आई

के
ज़ुल्म मैं उस पर भी करता ज़रूर
पर उसे बचाने में भी मेरी ही दुआ आई

ज़लील होता मैं अगर बक्श देता
फिर उसने भी नज़रें झपकाई

मैंने वफ़ा का लिहाज़ रखा और
मुझे मार गयी बेवफाई

ठीक उसी समय रूहो का कत्ल हुआ 
और मौत को भी शर्म आई

के इरादा नैक था तो मोहब्बत करने लगे 
 इश्क़ हमने किया और हम बस उनकी जरूरत बनने लगे

के कातिल ने फ़िर अपनी ज़ुल्फें हवा में लहराई

किसी का दिल टुटा और कब्र आशिक़ ने अपनी कुछ यूं खुदाई 

रूह का कत्ल हुआ और मौत को भी शर्म आई

फ़र्श पर बिखरे टुकड़े थे
एक गाना था कुछ मुखड़े थे

राग छिड़ा मोहब्बत का जब
सुर कुछ उखड़े - उखड़े थे

मोहब्बत फिर अब खत्म हुई 
किसी के घर मातम मना
ओर किसी के घर बजी शेहनाई 

रूहों का क़त्ल हुआ 
ओर मौत को भी शर्म आई



अप्रतिम और अप्रकाशित                                                                   By PRASHANT GURJAR



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Tuesday, 3 September 2019

तेरे फ़ासलों के फ़ैसलों से ख़फ़ा हूँ मैं



तेरे फ़ासलों के फ़ैसलों से ख़फ़ा हूँ मैं



तेरे फ़ासलों के फ़ैसलों से ख़फ़ा हूँ मैं
मोहब्बत मैं तुझे हुआ नफ़ा हूँ मैं

अब चाहे पछता तू सनम
पर अब तो तेरी ज़िंदगी से दफ़ा हूँ मैं

तू छोड़ कर मुझको रह कहाँ पाएगी
मुझसे दूर होकर भी तू मेरे नज़दीक आएगी 

मुझे चाहकर अब तू ना जाने कैसे किसी 
और को चाहेगी

ख़त्म हूँ तेरे लिए पर तेरे अंदर 
हरदफा हूँ मैं 

तेरे फ़ासलों के फ़ैसलों से ख़फ़ा हूँ मैं

बेशक तुझे अब मेरी ज़रूरत नहीं
ओर मैं भी अब तेरे कुर्बत नहीं

तुझे जाना है पता था मुझे 
इस बात पर अब मुझे कोई हैरत नहीं

तेरे साथ था जब तब गंदा था मैं
पर अब एक दम सफ़ा हूँ मैं

तेरे फ़ासलों के फ़ैसलों से ख़फ़ा हूँ मैं

तू लेले सब कुछ जो तेरा है
ये रूह तो थी तेरी
ये जिस्म भी लेजा जो सिर्फ़ कहने को मेरा है

वो वादे वो कसमें भी लेती जाना
पर आख़री बार मुझे बस इतना बताना

क्या नया प्यार भी मुझ जितना गहरा है

जा तुझे माफ़ किया 
जा तुझे माफ़ किया

दुनिया के सामने क़बूल करता हूँ कि बेवफ़ा हूँ मैं
पर मेरे हमदम मेरे दोस्त
तेरे फ़सलों के फ़ैसलों से ज़िंदगी भर ख़फ़ा हूँ मैं..



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Thursday, 1 August 2019

छुट्टी वाला प्यार..।


छुट्टी वाला प्यार हूँ मैं

छुट्टी वाला प्यार हूँ मैं
 गर्मियों में भी आती है 
और सर्दियों में भी आती है 

जो जाते वक़्त ख़ूब रुलाती है 
मेरी मोहब्बत सिर्फ़ छुट्टियों  में आती है

शाम होते ही मुझे टेलिफ़ोन मिलाती है 
मेरी मोहब्बत सिर्फ़ छुट्टियों में आती है 

उसके लिए होली और दिवाली  के 
बीच का त्योंहार हूँ  मैं 

किसी  का छुट्टी वाला प्यार हूँ मैं 

वो मेरी बातों का जवाब बड़ी ख़ूबसूरती से देती है 
मेरे पास आकर भी वो  मुझसे दूर रहती है 

गर्मियों की शामों में तय होता है 
उसका अपने परिवार के साथ टहलना

और  उसकी गली की ख़ुशबू से मेरे दिल का बहलना

हर मुलाक़ात पर वो अपने शहर के कई 
क़िस्से सुनाती है 

अपने सारे दोस्तों के बारे में बताती है 

मुझे लगता है उसके शहर में भी उसकी 
एक मोहब्बत होगी 

पर ख़ुश रहता हूँ मैं की वो कम से कम 
छुट्टियों में तो मेरे बारे में सोचती होगी 

ये सब जानकर भी उससे शादी करने के 
लिए तैयार हूँ मैं

नादानी में याद ना रहा मुझे की
उसका छुट्टी वाला प्यार हूँ मैं

जाने कहाँ खो जाते हैं वो दिन 
पता ही नहीं चलता 

और उसके अपने घर लौटने का वक़्त आ जाता है 
उसके जाने के ग़म को दबाने में एक अरसा बीत  जाता है

और  फिर से सर्दियों में मेरा छुट्टी वाला प्यार आ जाता है

हर हफ़्ते तो नहीं  पर साल में सिर्फ़ दो बार आने वाला
उसका इतवार हूँ मैं

किसी का छुट्टी वाला प्यार हूँ मैं..।


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Saturday, 29 June 2019

क्या लाज़मी है तेरा रूठ कर जाना ..?


“लाज़मी है तेरा रूठ कर जाना”


लाज़मी है तेरा रूठ कर जाना
मेरे सारे सचों को तेरा झूँठ कर जाना

तेरे बे-वफ़ा होने पर भी
मेरा तुझको टूट कर चाहना

फिर भी मोहब्बत में लाज़मी है तेरा
रूठ कर जाना..

कुछ तू मुझे सुनती नहीं है
और
कुछ मेरा कहना ठीक नहीं है

मोहब्बत सबसे ज़रूरी है शायद
इसलिए बिना ग़लती के मनाने की
रीत नई है..

तुझसे लड़कर मैं बेचैन हो जाता हुँ
फिर मैं किसी मैखाने में कुछ यूँ खो जाता हूँ

जब सामने तु आती है
तो सारा नशा उतर जाता है मेरा

क्या लाज़मी है तेरा मेरी पूरी मैखाने की
शराब को
तेरा सिर्फ़ एक घूँट कर जाना

तु बता
क्या लाज़मी है तेरा रूठ कर जाना..

माना कि कुछ ग़लतियाँ मेरी भी है
कभी मैं बहुत जल्दी करता हूँ
और कभी बहुत देरी भी है

कुछ तेरी मैं सुनना नहीं चाहता
और
कुछ तुझे कहना नहीं चाहता

झगड़ा अपना दमदार है
पर मोहब्बत अपनी गहरी भी है

हर बार लड़ने पर भी
तुझमें एक हिस्सा है मेरा

और उस हिस्से की मौजूदगी
को तेरा सबूत कर जाना

सनम शान्त की
बताना ?

क्या अब भी लाज़मी है तेरा रूठ कर जाना..।


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Saturday, 25 May 2019

जो आज है वो कल नहीं..।


“जो आज है वो कल नहीं”


जो आज है वो कल नहीं
जो पल-पल है वो हरपल नहीं

जो आज है वो कल नहीं

समंदर है ये जज़्बात हमारे
पर तुम्हारे क़द के जितना
इसमें तल नहीं..

जो आज है वो कल नहीं

मोहब्बत करते हो तो इज़हार करो
एक तरफ़ा ही सही किसी से प्यार करो

किसी को मरने दो तुम पर
ओर किसी के ऊपर तुम मरो

जो आज का नज़ारा है
वो कल को ओझल सही..

जो आज है वो कल नहीं

तुम मिलोगे आज जिससे
वो तुम्हारी ज़िंदगी से एक दिन
रुख़सत् हो जाएगा

तुम इंतज़ार करोगे कल तक का
ओर वो शख़्स कहीं खो जाएगा

समय होगा तुम्हारे पास बहुत सारा
पर
शायद उसके पास कम समय का
कोई हल नहीं..

जो आज है वो कल नहीं

बहते रहो हमेशा नदियों की तरह
वो तालाब मत बनो जिसमें कोई
हलचल नहीं..

क्यूँ की मेरे दोस्त
मेरे हमदम

जो आज है वो कल नहीं ।।
जो आज है वो कल नहीं ।।


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Saturday, 27 April 2019

अभी कल ही की तो बात है.....।

“अभी कल ही की तो बात है”


अभी कल ही की तो बात है
जैसे कुछ बदला ही नहीं

सुबह हुई फिर से और फिर से अंधेरी रात है
बस अभी कल ही की तो बात है

सब साथ हुआ करते थे
थोड़ी सी मोहब्बत और
कई जिगरी यार हुआ करते थे

आज सिर्फ़ और सिर्फ़ जैसे
जो कल था मेरे पास उसकी मीठी याद है

अभी कल ही की तो बात है

तुम सुनो तो सही

कल वो मेरे साथ थी
आसमां साफ़ था और वो बड़ी हसीन रात थी

उसने नदानी समझा मेरी हर एक बात को
और मैं मज़ाक़ में कहता चला गया
अपने दिल के हर एक जज़्बात को

ना जाने उसने क्या सोचा होगा
अपनी दुनिया में लौटकर

याद करके ख़ुश हुई होगी या
ख़ूब हँसी होगी अपनी साँस रोक कर

क्या उसने मेरे दिल का हाल
ख़ुद को समझाया होगा

या उसने सिर्फ़ मुझे भुलकर
अपने दिल को ओर उलझाया होगा

मुझे पता है मुझे ग़लत समझती है
या यूँ कहूँ की समझती ही नहीं

सब कुछ पता है उसे शायद
या फिर
जानबूझकर वो हर चीज़ से अज्ञात है

जैसे अभी कल ही की बात है

मैं सोचता हूँ की वो क्या सोचती है मेरे बारे में

जब वो जा रही थी तो देखा मैंने
उसकी आँखो में आँसुओं की बरसात है

अभी कल ही की तो बात है

उसे सहारे की ज़रूरत नहीं पता है मुझे
पर मुझे तो उसके साथ चलना है

उसके ग़मों के आगे और उसकी हर ख़ुशी के बाद चलना है
ख़ूबसूरत वो है मगर
दिल उसका ओर सारे मेरे हालात हैं

अब भी महसूस कर सकता हूँ मैं उसे
जैसे बस कल ही की तो बात है

जैसे बस कल ही की तो बात है.....।


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Saturday, 6 April 2019

MUJHE CHUP REHNA PASAND HAI



"mujhe chup rehna pasand hai"


mujhe chup rehna pasan hai
khamosh rehkar apne dil ki
har baat kehna pasand hai

mujhe chup rehna pasand hai.....

ke main kuch keh saku main is layak nahi
maut to tay hai meri
par main kisi ki zindgi banane me sahayk nahi

vyarth hai mera jeena aur
vyarth lagti sabki meri har ek baat hai

bs isliye mujhe kuch naa kehna pasand hai

mujhe chup rehna pasand hai.....

ghamand kaho ise ya
kahlo ise kamzori meri

main sabki sab kuch sunta hu
kyu ki ye hai majboori meri

samarth nahi hu main ki kisi ko kuch bol saku
itna bada bhi main nahi ki
jazbaton ko noton me tol saku

mujhe band kamaro me itihas likhna
pasand hai

mujhe chup rehna pasand hai.....

main chup hu fir bhi meri baat
har ek tak pahuch jaati hai
maine suna tha ki deewaron ke bhi kaan hote hai
par naa jane mere dil ki deeware kaan kaha se laati hai

main to chup rehta hu magar
meri kalam chinkh-chinkh kar gaati hai

meri kalam ka chinkhna aur
is dniya ka dard sehna pasand hai

mujhe chp rehna pasand hai.....

khamosh rehkar apne dil ki har baat kehna pasand hai

mujhe chup rehna pasand hai......





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Saturday, 16 March 2019

ZINDAGI KO DOOR KAR LETA HOON....


“ZINDGI KO DOOR KAR LETA HOON”



Main tab - tab apni zindgi ko 
khud se door kar leta hoon

Jab - jab main is dil ko tujhse
Pyar karne ko majboor kar leta hoon

Dil ko pagal bana kar main uske samne
Tujh par gurur kar leta hoon

Main tab - tab apni zindgi ko
Khud se door kar leta hoon

Chod deta hoon kisi or se ummid lagana
Kisi ke pass jana
Kisi ko apna banana

Maykhane me kadam nahi rakhta main
Par tere pyar ka nazsha zarur kar leta hoon

Bas fir tab - tab main apni zindgi
Ko khud se door kar leta hoon

Tu pass hokar bhi mujhe sirf khayal
Lagti hai

Jiska koi jawab na ho wo sawal
Lagti hai

Main khudgarz ho jata hoon tere ishq me yun
Ki har baat mujhe sirf teri hi bemisal lagti hai

Mujhe jab bhi talab lagti hai teri
Main khud ko tab - tab
Teri Khushboo se surur kar leta hoon

Main tab - tab apni zindgi ko
Khud se door kar leta hoon

Badnami bhi hoti hai kabhi
Aur
Main kabhi khud ko tere ishq se
Mashoor kar leta hoon

Main tab - tab apni zindgi ko
Khud se door kar leta hoon

Main jab - jab is dil ko tujhse pyar
Karne ko majboor kar leta hoon

Fir

Main tab - tab apni zindgi
Ko khud se door kar leta hoon...



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Sunday, 20 January 2019

TERE AANE SE MENE GAM LIKHNA CHOD DIYA...

Tere aane se mene gam likhna chod diya
Tune na jaane kis tarah mere gamo ka rukh mod diya

Tere aane se mene gam likhna chod diya

Kisi se na pyaar krne ka waada tha jo mera khud se
Use mene tere liye tod diya

Tere aane se mene gam likhna chod diya

Tujhse pyaar h mujhe jb tk mere jism ka har ek ansh na jal jaaye tb tk

Bs ek iccha h meri ki saath rhe tu hmesha
Hr waqt yeh dua hi mai pahuchana chahta hu rab tk

Mujhe yakeen nhi hota ab bhi tune kuch yu mere tute dil ko jod diya
Tere aane se mene gam likhna chod diya

Sochna bhi chaahu toh soch nhi pata mai wo waqt jb tu mere saath na thi
Mai gam toh likhta tha magar
Mere shabdo mien wo bt na thi

Jb nagmo pe mere taaliyaan gunjti thi mehfil mien
Mai khushi likhunga kbhi iss cheez ki mujhe aas na thii

Dikhave ki hasi se thak chuka tha mai
Ab mene muskurahato ka chauga odh liya

Tere aane se mene gam likhna chod diya

Tera hath thaam kar mene aansuo ka daman chod diya

Tere aane se mene gam likhna chod diya...


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Tuesday, 1 January 2019

FIR SE NAYA SAAL AAGYA...


Fir se naya saal aa gya
Kai jawab Diye mene
Is beete hue saal mein
Ab fir ek naya sawal aa gya
Fir se naya saal aa gya

Raat din jeeta aaya hu mai
Jinhe
Wo fir se ek naya khayaal
Aa gya

Fir se naya saal aa gya

Kuch Naye logo ko sath lekr
Apne Jine ki kuch aas lekr

Kuch naye faislo ke sath
Badh rha hu aage mai

Apne dil ki baat kehkar

Pal bhar hi lga ise bhi badlne mien
PR aage fir se 365 din ka ek jaal
Aa gaya


Fir se naya saal aa gaya

Kirdar ab or bhi naye milenge
Zindagi me

Kuch bhes tum khud badloge
Kuch libaz tumhe pehnae honge zindagi
Ne

Kuch bate tum is saal badlne ki koshish
Karoge

Tute rishte fir se jodne ki koshish
Karoge
Tum sochoge ki ab sab thik hoga
Or ant me kahoge ki ye
Fir se naya bawaal aa gaya

Ki mere dekhte hi dekhte dekho
Fir se naya saal aa gya

Purani bato ko chodakar
Ab naye ki taraf badho yaaro

Ke ab fir se zindagi ne ek moka
Diya h tumhe kuch karne ka

Yun samjho Bs ye 1 saal h isi me
itihaas gado yaaro

Khud se kehna har pal
Ki ab me tayar hu

Bura waqt jo mne dekha
Us waqt ka ye malal aa gya

Ab fir ek ank badal kar naya saal aa gaya


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