Wednesday, 29 July 2020

Sunday, 21 June 2020

चलो सो जाते हैं ।



चलो सो जाते हैं
तुम हो जाना किसी ओर के 
ओर हम तुम्हारे हो जाते हैं
चलो सो जाते हैं

किनारा भी नज़दीक नहीं
मुड़ने की कोई रीत नहीं

वक्त की लहरे ख़िलाफ़ हैं
तो इन लहरों के संग हो जाते हैं

चलो सो जाते हैं

ख़ुदा भी नाराज़ हैं
दिल में छुपे कई राज़ हैं

किसी दुःखद गाने के साज़ हैं
ये चीख है या आवाज़ हैं ?

चलो कान बंद करके
खामोशी में कहीं खो जाते हैं

चलो सो जाते हैं

हक़ीक़त से क्यूँ भागें हम
इस डर से क्यूँ अब जागें हम

मौत तो एक दिन आनी है
जान भी चली जानी है 

कई क़िस्से ओर एक कहानी है
हँसकर हमें निभानी हैं

दौलत की जगह चलो प्यार के बीज बो जाते हैं
चलो सो जाते है
चलो सो जाते हैं । 

अप्रतिम और अप्रकाशित                                                                   By PRASHANT GURJAR



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Sunday, 26 April 2020

मेरा अपना कोई नहीं ।


मेरा अपना कोई नहीं


मेरा अपना कोई नहीं
उस वक़्त में रातें सोई नहीं
मेरा अपना कोई नहीं

एक कश्ती दी छोटी मुझको
और सामने गहरा दरिया था

मैं खुश कैसे तन्हाई मैं
ये दुःख देने का ज़रिया था

वो आँख भी उस दिन रोइ नहीं
के मेरा अपना कोई नहीं

वो फुल पतझड़ में खिला हुआ
वो शक़्स किसी से मिला हुआ

वो लम्हें साथ बिताए जो
उन लम्हों का भी गिला हुआ

वो फसल जो मैंने बोई नहीं
के मेरा अपना कोई नहीं

टूट - टूट कर बिखरा था
पत्थर चोंटो से निखरा था

पत्थर ही था पत्थर ही रहा
मैं खुद पर कैसे इतराता

हर रात आस सवेरे की
जो न दिखता उस चेहरे की

ये जंग ही है खुद की खुद से
ना तेरे की ना मेरे की

वो ज्योत भी फिर से जोई नहीं
के मेरा अपना कोई नहीं

हर घाव दवा को तरसा है
तू मुझ पर ही क्यों बरसा है

ए ख़ुदा बता क्या गुनाह हुआ
अब चैन आए को अरसा है

जैसे गरम हवा खलियानों में
कितना गम मेरे तरानों में

हर लेख में एक कहानी है
जो बीत रही वो जवानी है

जो पीकर मेरी प्यास बुझे
कहाँ वो दरिया का पानी है

ईर्द - गिर्द देखूं जब भी
कोई नहीं दिखता अब भी


तनहा ही था तनहा ही रहा
के रूठ चुका मेरा रब भी

पर उम्मीद अभी भी खोई नहीं
के मेरा अपना कोई नहीं

- प्रशान्त गुर्जर

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Wednesday, 4 March 2020

मचल रही है आरज़ू



मचल रही है आरज़ू 
जल रही है आबरू

इस ज़लज़ले से भाग तू
सो मत अब जाग तू

तू क्या है ये ज्ञात कर
शीशे से तू ये बात कर

हो तुझको तेरी जुस्तजू

मचल रही है आरज़ू
जल रही है आबरू

अपनो को दिल है खोजता
न मिलने पर है सोचता

मैं किस किस पर बोझ था
कितने दिन मैं रोज़ था

ज़रूरतों पर दौड़ता
किसके हाथ जोड़ता

दौडूं ओर या सांस लूँ

मचल रही है आरज़ू
जल रही है आबरू

तिलतिल हूँ मर रहा
क्या किया था क्या कर रहा

वो दिया भीतर जल रहा
वो लोहा भी पिघल रहा

ज़िंदा है अभी रूह भी
कोयल भी है और कुह भी

आ खुद को खुद ही हाथ दूँ

मचल रही है आरज़ू
जल रही है आबरू

मैं कब तक ये सब सहन करूँ
मर जाऊँ या रहम करुँ

के अब शायद सब अच्छा हो
खुश होऊं या वहम करुँ

महसूस नहीं होता कुछ भी
साथ चले खुशियाँ दुःख भी

सीने में अटकी सांस यूँ

मचल रही है आरज़ू
जल रही है आबरू



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Sunday, 24 November 2019

हादसा है ज़िंदगी




हादसे ही है यहाँ या हादसा है जिंदगी
तू हादसों से लड़ झगड़ तो बादशाह है ज़िन्दगी

पास गम का खाब है
आंखों में तेरे प्यास है

इस प्यास को तू ओर जगा
है वास्ता ए ज़िन्दगी

हादसे ही है यहाँ या हादसा है जिंदगी

के जोड़ दे तो तोड़ दे खुद को यूं मरोड़ दे

खाख कर तू खुद को यूं के राख सी हो ज़िन्दगी

हादसे ही है यहाँ या हादसा है ज़िन्दगी

हाथ तेरे कुछ नहीँ
ज्ञात तुझको कुछ नहीं

बात कर ओर याद रख
के जंग है ये ज़िन्दगी

खुद को करदे सोना फिर सोने सी हो ये ज़िन्दगी

हादसे ही है यहाँ या हादसा है जिंदगी

लड़ जा तू मौत से
कर बात सीना ठोक के

इन सायों को तू दूर कर
ओर खुद को ही तू ज्योत दे

हर हार की तू मात बन
फिर जीत ही है जिंदगी

के हादसे ही है यहाँ या हादसा है ज़िन्दगी

के सुन मत ये शोर है
के सबके दिल मे चोर है

तू सूर्य है दहक रहा
ये अंधेरा भी घनघोर है

दुनिया पर कर फतह 
सिकन्दर है जिंदगी

हादसों से लड़ यहाँ
या हादसा ही बन यहाँ

के हादसे ही है यहाँ या हादसा है ज़िदंगी

के बन रहा तो ओर बन
के घट रहा तो दौर बन

खुद को यूँ गीठान दे
न टूटे तू वो डोर बन

ये साज़ सुन
ओर शोर बन

इमारत है तू ओर बन

बस मंज़िलो को ही पहुँचे तू
ओर रास्ता हो ज़िन्दगी

के हादसों की हार कर
ओर बन हादसा ए ज़िन्दगी

के हादसे ही है यहाँ या हादसा है ज़िन्दगी
के हादसे ही है यहाँ या हादसा है ज़िन्दगी




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Sunday, 20 October 2019

रूहों का क़त्ल ।



रूहों का क़त्ल हुआ
ओर मौत को भी शर्म आई

उतरा जब मैं मैदान-ए- जंग में तो
मेरे सामने वफ़ा आई

के
ज़ुल्म मैं उस पर भी करता ज़रूर
पर उसे बचाने में भी मेरी ही दुआ आई

ज़लील होता मैं अगर बक्श देता
फिर उसने भी नज़रें झपकाई

मैंने वफ़ा का लिहाज़ रखा और
मुझे मार गयी बेवफाई

ठीक उसी समय रूहो का कत्ल हुआ 
और मौत को भी शर्म आई

के इरादा नैक था तो मोहब्बत करने लगे 
 इश्क़ हमने किया और हम बस उनकी जरूरत बनने लगे

के कातिल ने फ़िर अपनी ज़ुल्फें हवा में लहराई

किसी का दिल टुटा और कब्र आशिक़ ने अपनी कुछ यूं खुदाई 

रूह का कत्ल हुआ और मौत को भी शर्म आई

फ़र्श पर बिखरे टुकड़े थे
एक गाना था कुछ मुखड़े थे

राग छिड़ा मोहब्बत का जब
सुर कुछ उखड़े - उखड़े थे

मोहब्बत फिर अब खत्म हुई 
किसी के घर मातम मना
ओर किसी के घर बजी शेहनाई 

रूहों का क़त्ल हुआ 
ओर मौत को भी शर्म आई



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Tuesday, 3 September 2019

तेरे फ़ासलों के फ़ैसलों से ख़फ़ा हूँ मैं



तेरे फ़ासलों के फ़ैसलों से ख़फ़ा हूँ मैं



तेरे फ़ासलों के फ़ैसलों से ख़फ़ा हूँ मैं
मोहब्बत मैं तुझे हुआ नफ़ा हूँ मैं

अब चाहे पछता तू सनम
पर अब तो तेरी ज़िंदगी से दफ़ा हूँ मैं

तू छोड़ कर मुझको रह कहाँ पाएगी
मुझसे दूर होकर भी तू मेरे नज़दीक आएगी 

मुझे चाहकर अब तू ना जाने कैसे किसी 
और को चाहेगी

ख़त्म हूँ तेरे लिए पर तेरे अंदर 
हरदफा हूँ मैं 

तेरे फ़ासलों के फ़ैसलों से ख़फ़ा हूँ मैं

बेशक तुझे अब मेरी ज़रूरत नहीं
ओर मैं भी अब तेरे कुर्बत नहीं

तुझे जाना है पता था मुझे 
इस बात पर अब मुझे कोई हैरत नहीं

तेरे साथ था जब तब गंदा था मैं
पर अब एक दम सफ़ा हूँ मैं

तेरे फ़ासलों के फ़ैसलों से ख़फ़ा हूँ मैं

तू लेले सब कुछ जो तेरा है
ये रूह तो थी तेरी
ये जिस्म भी लेजा जो सिर्फ़ कहने को मेरा है

वो वादे वो कसमें भी लेती जाना
पर आख़री बार मुझे बस इतना बताना

क्या नया प्यार भी मुझ जितना गहरा है

जा तुझे माफ़ किया 
जा तुझे माफ़ किया

दुनिया के सामने क़बूल करता हूँ कि बेवफ़ा हूँ मैं
पर मेरे हमदम मेरे दोस्त
तेरे फ़सलों के फ़ैसलों से ज़िंदगी भर ख़फ़ा हूँ मैं..



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Thursday, 1 August 2019

छुट्टी वाला प्यार..।


छुट्टी वाला प्यार हूँ मैं

छुट्टी वाला प्यार हूँ मैं
 गर्मियों में भी आती है 
और सर्दियों में भी आती है 

जो जाते वक़्त ख़ूब रुलाती है 
मेरी मोहब्बत सिर्फ़ छुट्टियों  में आती है

शाम होते ही मुझे टेलिफ़ोन मिलाती है 
मेरी मोहब्बत सिर्फ़ छुट्टियों में आती है 

उसके लिए होली और दिवाली  के 
बीच का त्योंहार हूँ  मैं 

किसी  का छुट्टी वाला प्यार हूँ मैं 

वो मेरी बातों का जवाब बड़ी ख़ूबसूरती से देती है 
मेरे पास आकर भी वो  मुझसे दूर रहती है 

गर्मियों की शामों में तय होता है 
उसका अपने परिवार के साथ टहलना

और  उसकी गली की ख़ुशबू से मेरे दिल का बहलना

हर मुलाक़ात पर वो अपने शहर के कई 
क़िस्से सुनाती है 

अपने सारे दोस्तों के बारे में बताती है 

मुझे लगता है उसके शहर में भी उसकी 
एक मोहब्बत होगी 

पर ख़ुश रहता हूँ मैं की वो कम से कम 
छुट्टियों में तो मेरे बारे में सोचती होगी 

ये सब जानकर भी उससे शादी करने के 
लिए तैयार हूँ मैं

नादानी में याद ना रहा मुझे की
उसका छुट्टी वाला प्यार हूँ मैं

जाने कहाँ खो जाते हैं वो दिन 
पता ही नहीं चलता 

और उसके अपने घर लौटने का वक़्त आ जाता है 
उसके जाने के ग़म को दबाने में एक अरसा बीत  जाता है

और  फिर से सर्दियों में मेरा छुट्टी वाला प्यार आ जाता है

हर हफ़्ते तो नहीं  पर साल में सिर्फ़ दो बार आने वाला
उसका इतवार हूँ मैं

किसी का छुट्टी वाला प्यार हूँ मैं..।


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Saturday, 29 June 2019

क्या लाज़मी है तेरा रूठ कर जाना ..?


“लाज़मी है तेरा रूठ कर जाना”


लाज़मी है तेरा रूठ कर जाना
मेरे सारे सचों को तेरा झूँठ कर जाना

तेरे बे-वफ़ा होने पर भी
मेरा तुझको टूट कर चाहना

फिर भी मोहब्बत में लाज़मी है तेरा
रूठ कर जाना..

कुछ तू मुझे सुनती नहीं है
और
कुछ मेरा कहना ठीक नहीं है

मोहब्बत सबसे ज़रूरी है शायद
इसलिए बिना ग़लती के मनाने की
रीत नई है..

तुझसे लड़कर मैं बेचैन हो जाता हुँ
फिर मैं किसी मैखाने में कुछ यूँ खो जाता हूँ

जब सामने तु आती है
तो सारा नशा उतर जाता है मेरा

क्या लाज़मी है तेरा मेरी पूरी मैखाने की
शराब को
तेरा सिर्फ़ एक घूँट कर जाना

तु बता
क्या लाज़मी है तेरा रूठ कर जाना..

माना कि कुछ ग़लतियाँ मेरी भी है
कभी मैं बहुत जल्दी करता हूँ
और कभी बहुत देरी भी है

कुछ तेरी मैं सुनना नहीं चाहता
और
कुछ तुझे कहना नहीं चाहता

झगड़ा अपना दमदार है
पर मोहब्बत अपनी गहरी भी है

हर बार लड़ने पर भी
तुझमें एक हिस्सा है मेरा

और उस हिस्से की मौजूदगी
को तेरा सबूत कर जाना

सनम शान्त की
बताना ?

क्या अब भी लाज़मी है तेरा रूठ कर जाना..।


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